होली ,का त्यौहार
होली कब मनाते हैं
होली भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
होली कैसे मनाते हैं
इस दिन शाम के समय लकड़ियों को इकट्ठा करके जलाया जाता है। जिसे होलिका दहन कहते हैं । लोग इसके आसपास इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं। उसके बाद एक दूसरे को रंग लगाते हैं। इसके बाद दूसरे दिन भी एक दूसरे को रंग लगाते हैं । दूसरे दिन तरह-तरह की मिठाइयां जैसे गुजिया ,मालपुआ वगैरह बनाए जाते हैं। हर राज्य में वहां के लोकगीत और नृत्य गाए जाते हैं । उत्तर प्रदेश में होली के गीतों को फगुआ कहा जाता है। शहरों में कई तरह के मनोरंजक कार्यक्रमों का और कवि सम्मेलनों का भी आयोजन होता है । बृज में भगवान कृष्ण की राधा और गोपियों के साथ होली खेलने की कथा प्रचलित है। उत्तर भारत के कुछ भागों में लठमार होली खेली जाती है ।औरतें लकड़ी से पति को मारने दौड़ती हैं और पति ढाल से स्वयं की रक्षा करते हैं । भारत के अलग-अलग प्रांतों में सभी हिंदू होली मनाते हैं । विदेशों में भी जो हिंदू बसे हैं वो जगह-जगह पर होली मनाते हैं । होली के त्योहार के पीछे एक बहुत बड़ी कहानी प्रचलित है।
होली क्यों मनाते हैं
हिरण्यकश्यप एक राक्षस था। उसने कड़ी तपस्या के बाद कई वरदान प्राप्त कर लिए। उनमें से एक वरदान ऐसा था जिस जिस ने उसे मृत्यु के डर से मुक्त कर दिया था । हिरण्यकश्यप को यह वरदान था कि ना उसकी मौत का कारण नर होगा ना पशु होगा । उसकी मौत ना धरती पर होगी ना आकाश में होगी । ना दिन में ना रात में होगी । घर के अंदर भी नहीं और घर के बाहर भी नहीं होगी । इस वरदान के घमंड में आकर उसने अपने आप को ही भगवान मानना शुरू कर दिया। हिरण्यकश्यप का एकपुत्र था प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था। वह सुबह शाम नारायण का जप करता था। हिरण्यकश्यप इस बात से बहुत नाराज होता था । एक बार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुला भेजा । होलिका को आग में ना जलने का वरदान था । उसने होलिका से प्रार्थना की कि वह प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि में बैठ जाए और ताकि प्रहलाद भस्म हो जाए और होलिका को तो अग्नि जला ही नहीं सकती थी। होलिका ने उसकी बात मान ली । वह प्रहलाद को लेकर जलती हुई अग्नि में बैठ गई; परंतु प्रहलाद नारायण नारायण का जाप करते रहे। होली का अग्नि में जलकर भस्म हो गई परंतु प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ प्रहलाद ज्यों के त्यों निकल आए । इसी दिन को होलिका दहन के रूप में मनाया जाने लगा। हिरण्यकश्यप इस बात से बहुत क्रोधित हुआ और उसने प्रहलाद को खंभे से बांध दियालेकिन प्रहलाद नारायण नारायण करते रहे अचानक भगवान विष्णु ने नृसिंह के रूप में खंभे से प्रकट होकर हिरण्यकश्यप को अपनी जांघ पर लिटा दिया और उसे मार डाला। इस तरह हिरण्यकश्यप ना धरती पर ना आकाश में मरा ।जिस समय पर हिरण्यकश्यप को मारा गया उस समय पर ना दिन था ना रात था वह गोधूलि बेला थी। भगवान नरसिंह ने हिरण कश्यप को ठीक महल के दरवाजे पर ले जाकर अपने पांव पर रखकर मारा था। यानी कि हिरण्यकश्यप ना महल के अंदर था ;ना महल के बाहर ।
होली का त्यौहार यह संदेश देता है कि एक न एक दिन अन्याय, अहंकार और पाप पर न्याय, सत्य और सतकर्मों की जीत होती है। ईश्वर के यहां देर है पर अंधेर नहीं ।
निबंध में महत्वपूर्ण पैराग्राफ
होली कब मनाते हैं
होली कैसे मनाते हैं
होली क्यों मनाते हैं
FAQS
१ होली कब मनाई जाती है?
१ होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।
२ प्रहलाद कौन थे?
२ प्रहलाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे ।वह राक्षस हिरण्यकश्यप के पुत्र थे।
३ होलिका कौन थी?
३ होलिका हिरण्यकश्यप की बहन और प्रहलाद की बुआ थी।
होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं
लेखिका- संगीता मिश्रा



This story remind me childhood time many more time heard curiously. It’s very nice story. It’s described very well.
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