,, जीत के लिए जोश से जूझना है जरूरी। तृप्ति के लिए प्यास को बढ़ालो ।सुबह के लिए रात को गले लगाना है जरूरी।
हंसने की हसरतें है तो आंसुओं को पी के मुस्कुरा ले मूर्तियों को बनाना है तो पत्थरों को तोड़ना है जरूरी ।
चांदनी उन्हीं को दिखती है जो घटते बढ़ते चांद को निहारते ।
पूर्णिमा के आने तक अमावस में भी आशा के दीप को जलाए रखना है जरूरी।
किनारे पर बैठकर क्या खाक मंजिलें मिलें गी। , समुद्र को पार करना है तो लहरों को चीरकर बढ़ना है जरूरी ।जीत के लिए जोश से जूझना है जरूरी।
🖊 संगीता मिश्रा


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